माघ मास में आने वाली जया एकादशी का व्रत आज पूरे श्रद्धा भाव से रखा जा रहा है। शास्त्रों में जया एकादशी को चौबीस एकादशियों में विशेष महत्व प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत, जप, तप और दान करने से व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है।कहा जाता है कि जया एकादशी का व्रत करने से सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और ग्रह दोषों से मुक्ति का आशीर्वाद मिलता है। जया एकादशी का अर्थ ही है, हर बाधा पर विजय।मान्यता है कि इस पावन दिन भगवान श्री विष्णु और भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं और उनके जीवन के कष्टों को दूर करते हैं।
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आज माघ मास के शुक्लपक्ष की पावन एकादशी तिथि है, जिसे सनातन परंपरा में जया एकादशी व्रत के नाम से जाना जाता है. यह पावन व्रत साधक के सभी कष्टों को दूर करके कामनाओं को पूरा करने वाला माना गया है. जिस जया एकादशी व्रत के पुण्यफल से जीवन की सभी बड़ी बाधाएं दूर होती हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, उस पापनाशिनी एकादशी पर आज आखिर कैसे करें श्री हरि की पूजा? जया एकादशी व्रत की पूजा विधि, स्नान-दान का धार्मिक महत्व और इस व्रत से जुड़े सभी जरूरी नियम आदि को आइए विस्तार से जानते हैं.
शुभ मुहूर्त
माघ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी प्रारंभ : 28 जनवरी 2026, बुधवार की शाम 04:35 बजे
माघ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी समाप्त : 29 जनवरी 2026, गुरुवार को दोपहर 01:55 बजे
ब्रह्म मुहूर्त : प्रात:काल 04:59 से लेकर 05:50 बजे तक
अभिजित मुहूर्त : प्रात:काल 11:54 से दोपहर 12:39 बजे तक
विजय मुहूर्त : दोपहर 02:08 से लेकर 02:53 बजे तक
अमृत काल: प्रात:काल 09:26 से 10:54 बजे तक
पारण
जया एकादशी का पारण 30 जनवरी को किया जाएगा। पारण का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 10 मिनट से 9 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु इस समय विधि-विधान से व्रत का पारण कर सकते हैं।
पूजन विधि
जया एकादशी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
इसके बाद पूजा स्थल पर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित कर दीपक जलाना चाहिए।
इसके बाद जल या पंचामृत से अभिषेक कर तुलसी, फूल और चंदन अर्पित करें।
भोग में फल अर्पित करें क्योंकि आज अन्न का सेवन वर्जित रहता है।
दिनभर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करते हुए फलाहार या निर्जल व्रत रखें, अगर निर्जल व्रत न रख सकें तो फलाहार के साथ व्रत करें।
शाम के समय पुनः पूजा कर व्रत कथा सुनें और अगले दिन द्वादशी तिथि पर विधि-विधान से व्रत का पारण करें।
जया एकादशी की कहानी
जया एकादशी की कथा राजा इंद्र और गंधर्वों से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, इंद्र की सभा में नृत्य के दौरान गंधर्व माल्यवान और पुष्पवती कामभाव में लीन हो गए, जिससे नृत्य भंग हो गया। इससे क्रोधित होकर देवराज इंद्र ने दोनों को पिशाच योनि का श्राप दे दिया।
श्राप के कारण वे पृथ्वी पर भटकते रहे। वर्षों बाद एक ऋषि के मार्गदर्शन में दोनों ने माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के पुण्य प्रभाव से उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिली।
मान्यता है कि जया एकादशी का व्रत करने और कथा का पाठ करने से व्यक्ति को सभी कष्टों से मुक्ति और बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।
एकादशी के दिन क्या नहीं करना चाहिए
एकादशी के दिन चावल, मसूर, चना, मटर, बैंगन, फूलगोभी, प्याज, लहसुन जैसी तामसिक चीज़ें नहीं खानी चाहिए; दिन में सोना, झूठ बोलना, हिंसा करना, क्रोध करना, पान खाना और किसी की निंदा करना वर्जित है. साथ ही तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए और कांसे के बर्तन व शहद का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इन कार्यों से व्रत का पुण्य समाप्त हो सकता है.
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