आज पूरे देश में महाशिवरात्रि का पावन पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह हुआ था। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है।इस दिन शिव भक्त उपवास रखकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। श्रद्धालु शिवलिंग का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक करते हैं। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से की गई पूजा और जलाभिषेक से भगवान शिव प्रसन्न होकर मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। आज के दिन भक्त ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते हुए भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।अब सवाल है कि इस बार महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और किस समय पूजा करना सबसे फलदायी होगा। आइए जानते हैं इस वर्ष के जलाभिषेक और पूजा के शुभ समय के बारे में।
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आज फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि पर देशभर में महापावन महाशिवरात्रि पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक शिव आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।आज श्रद्धालु महाशिवरात्रि का व्रत रखकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना करेंगे। मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। शिवलिंग का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और बेलपत्र अर्पित कर भक्त भोलेनाथ से आशीर्वाद मांग रहे हैं। रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और ‘ॐ नमः शिवाय’ के जाप के साथ शिवभक्ति का वातावरण बना रहेगा।
ज्योतिषीय दृष्टि से भी आज का दिन विशेष माना जा रहा है। चंद्रमा मकर राशि में विराजमान हैं, जिससे पूजा-पाठ और साधना का महत्व और बढ़ गया है। मान्यता है कि इस शुभ संयोग में की गई उपासना विशेष फलदायी होती है।
महाशिवरात्रि के दिन के शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:17 बजे से 06:08 बजे तक
प्रातः सन्ध्या: सुबह 05:43 बजे से 07:00 बजे तक
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:13 बजे से 12:58 बजे तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:27 बजे से 03:12 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:09 बजे से 06:34 बजे तक
सायाह्न सन्ध्या: शाम 06:11 बजे से 07:28 बजे तक
अमृत काल: दोपहर 12:59 बजे से 02:41 बजे तक
निशिता मुहूर्त: 16 फरवरी की रात 12:09 बजे से 01:01 बजे तक
सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 07:00 बजे से शाम 07:48 बजे तक
चार प्रहर की पूजा का मुहूर्त
पहला प्रहर- 15 फरवरी को शाम 06:11 से रात 09:23 बजे तक
दूसरा प्रहर- रात 09:23 बजे से रात 12:35 बजे तक
तीसरा प्रहर- 16 फरवरी रात 12:35 बजे से सुबह 03:47 बजे तक.
चौथा प्रहर- 16 फरवरी को सुबह 03:47 से सुबह 06:59 बजे तक.
जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त
पहला मुहूर्त- सुबह 08.24 बजे से सुबह 09.48 बजे तक
दूसरा मुहूर्त- सुबह 09.48 बजे सुबह 11.11 बजे तक
तीसरा मुहूर्त- सुबह 11.11 बजे से दोपहर 12.35 बजे तक.
चौथा मुहूर्त- शाम 06.11 बजे से शाम 07.47 बजे तक
पूजन सामग्री
शिव पूजा में विशेष रूप से बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा और भांग का महत्व माना जाता है। इसके साथ ही आक के फूल और सफेद पुष्प भगवान शिव को अर्पित किए जाते हैं। पूजन के लिए दीपक, चंदन, रोली, अक्षत (चावल), सुपारी, जनेऊ और सिक्का भी शामिल किए जाते हैं।इसके अलावा कलश स्थापना के लिए नारियल, लौंग-इलायची, मिठाई और मौसमी फल भी पूजा में अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि इन सामग्रियों के साथ श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
महाशिवरात्रि 2026 शुभ योग
आज महाशिवरात्रि पर सभी कार्य सिद्ध करने वाला सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है, जो सुबह 7 बजे से शुरू होगा और 7 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. साथ ही इस दिन कुंभ राशि में सूर्य, बुध, शुक्र और राहु ग्रह रहने वाले हैं, जिससे चतुर्ग्रही योग, बुधादित्य योग, शुक्रादित्य योग समेत कई शुभ योग बन रहे हैं, जिससे आज के दिन का महत्व भी बढ़ गया है.
पूजन विधि
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर श्रद्धालु सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर व्रत का संकल्प लेते हैं और विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दिन की शुरुआत स्नान के बाद साफ और पवित्र स्थान पर पूजा की तैयारी से की जाती है।
पूजा के लिए एक चौकी स्थापित कर उस पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाया जाता है। इसके ऊपर अक्षत रखकर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद मिट्टी या तांबे के कलश पर स्वास्तिक बनाकर उसमें जल और गंगाजल मिलाकर भरा जाता है। कलश में सुपारी, सिक्का और हल्दी की गांठ डालकर विधिपूर्वक स्थापना की जाती है।
भगवान शिव के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित किया जाता है और पास में शिवलिंग स्थापित किया जाता है। श्रद्धालु चाहें तो मिट्टी से स्वयं भी शिवलिंग का निर्माण कर सकते हैं। इसके बाद गंगाजल और पंचामृत—जिसमें दूध, दही, घी, शहद और मिश्री शामिल होती है—से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। अभिषेक के दौरान ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप किया जाता है।
अभिषेक के पश्चात शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और फल-फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद महाशिवरात्रि की कथा का पाठ किया जाता है और कपूर से आरती उतारी जाती है। अंत में भगवान शिव को मिठाई और खीर का भोग लगाकर प्रसाद भक्तों में वितरित किया जाता है।
महाशिवरात्रि का महत्व
धर्म शास्त्रों में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है. अविवाहित युवतियां उत्तम वर की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. इस दिन ॐ नमः शिवाय मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना अत्यंत फलदायी माना गया है. शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक का फूल और गंगाजल अर्पित करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है. ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि महाशिवरात्रि का व्रत करने से ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है.
शिवजी के मंत्र:
ॐ नमः शिवाय
ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः सोमाय नमः
ऊँ ऐं ह्रीं शिव-गौरीमय-ह्रीं ऐं ऊँ
ऊँ नमो धनदाय स्वाहा
शिवजी रुद्र मंत्र:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
शिवजी की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ॐ जय शिव ओंकारा॥
महाशिवरात्रि की कथा
महाशिवरात्रि से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसी कारण इस तिथि पर व्रत, शिवलिंग अभिषेक और रात्रि जागरण का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धा से की गई पूजा से दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति होने की मान्यता है।
एक अन्य कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले विष हलाहल से सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया, जिससे वे नीलकंठ कहलाए। देवताओं ने पूरी रात उनका स्तुति-गान किया। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि का रात्रि जागरण इसी घटना की स्मृति में किया जाता है।





