मथुरा में अक्षय नवमी पर उमड़ी श्रद्धा की भीड़, राधे-राधे के जयकारों से गूंजी ब्रजभूमि

मथुरा में अक्षय नवमी पर उमड़ी श्रद्धा की भीड़

कान्हा की नगरी मथुरा में शुक्रवार को अक्षय नवमी पर्व पर भक्तिभाव और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। आधी रात से ही पंचकोसी और तीन वन परिक्रमा मार्ग पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। “राधे-राधे” के जयकारों से पूरा शहर गूंज उठा।भक्त नंगे पैर परिक्रमा करते नजर आए। भूतेश्वर, सरस्वती कुंड, चामुंडा देवी, विश्राम घाट और बंगाली घाट जैसे स्थलों पर हजारों भक्त एकत्र हुए। राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश से भी श्रद्धालु पहुंचे।हिंदू मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल नवमी को अक्षय नवमी कहा जाता है .इसे सतयुग के आरंभ का प्रतीक माना जाता है। इस दिन किया गया दान-पुण्य अक्षय फलदायी होता है।इसी दिन आंवला नवमी का पर्व भी मनाया गया। भक्तों ने आंवले के वृक्ष की पूजा कर दीपदान और दान-पुण्य किया।प्रशासन ने सुरक्षा और यातायात के पुख्ता इंतजाम किए। पूरे शहर में भक्तिभाव और दिव्यता का वातावरण छाया रहा, जिससे ब्रजभूमि भक्ति रंग में रंग उठी।

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कान्हा की नगरी मथुरा में शुक्रवार को अक्षय नवमी पर्व पर आस्था और भक्ति का अद्भुत नजारा देखने को मिला। आधी रात से ही पंचकोसी और तीन वन परिक्रमा मार्ग पर भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। “राधे-राधे” के जयकारों से पूरा शहर गूंज उठा।

नंगे पैर परिक्रमा करते श्रद्धालुओं के जत्थे भूतेश्वर, सरस्वती कुंड, चामुंडा देवी, गायत्री तपोभूमि, विश्राम घाट और बंगाली घाट जैसे प्रमुख स्थलों पर पहुंचे। राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों से आए भक्तों ने परिक्रमा में भाग लिया।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल नवमी को अक्षय नवमी कहा जाता है। इस दिन किया गया दान और परिक्रमा का फल अक्षय माना गया है, जो कभी नष्ट नहीं होता। पौराणिक कथाओं में इसे सतयुग के आरंभ का प्रतीक बताया गया है, इसलिए इसे “सत्य युगादि नवमी” भी कहा जाता है।

इसी अवसर पर आंवला नवमी का पर्व भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। भक्तों ने आंवले के वृक्ष की पूजा की, दूध अर्पित किया और दीपदान व दान-पुण्य किया। आयुर्वेद में आंवले को श्रेष्ठ औषधीय फल माना गया है जो शरीर को शीतलता प्रदान करता है।

श्रद्धालुओं ने वस्त्र, अन्न और कंबल का दान कर पुण्य अर्जित किया। प्रशासन ने सुरक्षा और यातायात के लिए विशेष व्यवस्थाएं कीं, जिससे भक्तों को परिक्रमा में कोई असुविधा न हो।भक्ति, आस्था और दिव्यता से ओतप्रोत इस पर्व ने मथुरा की गलियों और घाटों को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया, जिससे सम्पूर्ण ब्रजभूमि का वातावरण आलोकित हो उठा।

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