Mokshada Ekadashi: आज है मोक्षदा एकादशी का व्रत, जानें व्रत की विधि, मुहूर्त, मंत्र, आरती और पारण का समय, आज के दिन भूलकर न करें ये गलतियां, श्रीहरि हो जाएंगे नाराज

एकादशी

मोक्षदा एकादशी का व्रत 1 दिसंबर यानी आज रखा जा रहा है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, हर मास के कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष की 11वीं तिथि को एकादशी कहा जाता है। यह दिन भगवान विष्णु की आराधना, उपवास, जप और तप के लिए समर्पित होता है। माना जाता है कि विधि-विधान से किए गए एकादशी व्रत से व्यक्ति के जीवन के सभी दोष दूर होते हैं और उसे विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।लेकिन एकादशी का महत्व तब और बढ़ जाता है जब यह मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में पड़ती है। इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीमद् भगवद्गीता का उपदेश दिया था। इसलिए यह तिथि गीता जयंती के रूप में भी मनाई जाती है।

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मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है। खास बात यह है कि इसी दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है। मान्यता है कि कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में इसी पवित्र तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद् भगवद्गीता का ज्ञान दिया था।शास्त्रों के अनुसार, मोक्षदा एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। कहा जाता है कि इस व्रत को रखने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और भक्त को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। इसी कारण इसका नाम ‘मोक्षदा’ पड़ा. क्योंकि यह दिन मनुष्य ही नहीं, बल्कि पितरों को भी मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। यहां जाने मोक्षदा एकादशी का महत्व, सही पूजा विधि और आज के शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी।

मोक्षदा एकादशी 2025 पूजा मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: 05:08 ए एम से 06:02 ए एम
अभिजित मुहूर्त: 11:49 ए एम से 12:31 पी एम
गोधूलि मुहूर्त: 05:21 पी एम से 05:48 पी एम
विजय मुहूर्त: 01:55 पी एम से 02:37 पी एम

भगवान विष्णु का मंत्र

मंत्र – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और ॐ नमो नारायणाय
विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्
शांताकारं मंत्र
शांताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।
लक्ष्मीकांतं कमल नयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।

मोक्षदा एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व 
हिंदू मान्यता के अनुसार मोक्षदा एकादशी व्रत को विधि-विधान से रखने पर व्यक्ति के जीवन से जुड़े सारे कष्ट दूर और कामनाएं पूरी होती हैं. भगवान विष्णु के आशीर्वाद से उसके जीवन से जुड़े सारे दोष दूर हो जाते हैं और वह सभी पापों से मुकत् होकर सारे सुखों को भोगता हुआ अंत समय में मोक्ष को प्राप्त होता है. इस व्रत को करने से विष्णु तीर्थ के दर्शन और पूजन का पुण्यफल प्राप्त होता है.

मोक्षदा एकादशी पूजा विधि

अब बात करते हैं मोक्षदा एकादशी की पूजा विधि की। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान और ध्यान के बाद शुद्ध वस्त्र धारण किए जाते हैं और व्रत का संकल्प लिया जाता है।पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर गंगाजल का छिड़काव किया जाता है। भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, पंचामृत और पीले वस्त्र अर्पित करने का विधान है। इसके बाद चंदन, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य समर्पित किए जाते हैं।धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन 21 तुलसी दल जरूर अर्पित किए जाते हैं, क्योंकि विष्णु पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है। भक्त तुलसी की माला से ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करते हैं और देसी घी के दीपक से आरती उतारते हैं।इस दिन फलाहार या निर्जला व्रत रखने का विशेष महत्व बताया गया है। साथ ही रात्रि में श्रीहरि के नाम का कीर्तन और जागरण अत्यंत शुभ माना जाता है।

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चंपकनगर नामक राज्य में राजा वैखानस रहता था। एक बार राजा को ऐसा सपना आया जिसमें उसके पूर्वज नरक में कष्ट झेलते दिखाई दिए। सपना देखकर राजा दुखी और व्याकुल हो उठा और उसने ब्राह्मणों से समाधान पूछा।

ब्राह्मणों ने राजा को पर्वत ऋषि के आश्रम जाने की सलाह दी। ऋषि ने पूरी बात सुनने के बाद राजा से कहा कि मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली मोक्षदा एकादशी का व्रत करो। यह व्रत पितरों को नरक से मुक्त करता है।

ऋषि की सलाह पर राजा ने विधिपूर्वक मोक्षदा एकादशी का व्रत रखा, और कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से उसके पूर्वज सभी पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त हुए।

विष्णुजी की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

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