वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने ट्रस्ट के गठन पर रोक लगाते हुए मंदिर प्रबंधन से जुड़ा मामला हाईकोर्ट को भेज दिया है। कोर्ट ने कहा कि मंदिर की देखरेख अब हाईकोर्ट के एक पूर्व जज की अध्यक्षता वाली अंतरिम समिति करेगी। समिति में सरकारी अधिकारी और गोस्वामी समाज के प्रतिनिधि होंगे। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जब तक हाईकोर्ट निर्णय नहीं देता, तब तक राज्य सरकार की बनाई नई ट्रस्ट समिति को लागू नहीं किया जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश सरकार को बड़ा झटका देते हुए वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर के ट्रस्ट के संचालन पर अस्थाई रोक लगा दी। सरकार ने 26 मई 2025 को एक अध्यादेश जारी किया था, जिसके तहत ‘श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास’ का गठन किया गया। इस ट्रस्ट को मंदिर के प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुविधाओं की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लेकिन इस फैसले के खिलाफ 27 मई को याचिकाएं दायर की गई थीं, जिन पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रस्ट की गतिविधियों पर रोक लगाने का आदेश दिया।
जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने निर्देश दिया कि जब तक इलाहाबाद हाई कोर्ट इस अध्यादेश की वैधता पर निर्णय नहीं देता, तब तक उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित कमेटी कार्य नहीं करेगी। इसके स्थान पर एक नई अंतरिम समिति बनाई जाएगी, जिसकी अध्यक्षता हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे। इस समिति में कुछ सरकारी अधिकारी और गोस्वामी परिवार के प्रतिनिधि शामिल होंगे, जो परंपरागत रूप से मंदिर की देखभाल करते आए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 15 मई 2025 के उस आदेश पर भी पुनर्विचार का संकेत दिया, जिसमें राज्य सरकार को मंदिर के धन से बांके बिहारी कॉरिडोर के विकास और 5 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की अनुमति दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह शनिवार तक इस मामले में लिखित आदेश जारी करने का प्रयास करेगी। तब तक के लिए ट्रस्ट के संचालन को निलंबित रखा जाएगा और याचिकाकर्ताओं को अध्यादेश को हाई कोर्ट में चुनौती देने की छूट दी जाएगी।
सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि उसकी मंशा मंदिर पर कब्जा करने या फंड को हड़पने की नहीं है, बल्कि भीड़ प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यह कदम उठाया गया था। लेकिन याचिकाकर्ता पक्ष ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सरकार ने बिना अधिकार के मंदिर प्रबंधन में हस्तक्षेप किया और गोस्वामी परिवार को बाहर कर दिया गया, जो सदियों से इस मंदिर की सेवा कर रहा है।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील श्याम दीवान ने यह भी कहा कि मंदिर एक निजी धार्मिक स्थल है और सुप्रीम कोर्ट ने बिना याचिकाकर्ताओं को सुने 15 मई को फंड के उपयोग की अनुमति दे दी। कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए पूछा कि अगर लाखों लोग मंदिर में दर्शन करने आते हैं तो श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर के फंड का उपयोग क्यों नहीं किया जाना चाहिए।
विवाद का मुख्य कारण सरकार द्वारा तेजी से अध्यादेश लाकर ट्रस्ट का गठन करना था, जिससे परंपरागत प्रबंधन व्यवस्था प्रभावित हुई। इससे पहले मंदिर के आसपास के क्षेत्र में कॉरिडोर निर्माण को लेकर स्थानीय महिलाओं सहित कई लोग 72 दिनों से लगातार प्रदर्शन कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने मंदिर में दर्शन-पूजन कर अपनी खुशी जताई और बधाई गीत गाए।
अब पूरा मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट को सौंपा गया है, जहां इस अध्यादेश की संवैधानिक वैधता की जांच होगी। तब तक मंदिर का प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित अंतरिम समिति संभालेगी।





